स्मृतियां भी बड़ी अजीब होती हैं। कभी किसी पुराने बरोठे के अंधेरे कोने को देख स्मृति का दौरा आता है तो कभी बहुत भीड़ भाड़ और चिल्ल पों के बीच वह सर उठा लेती हैं।
90 का दशक एकाध कदम चल चुका था । और मनमोहन सिंह संसद में उदार आर्थिक नीतियों वाला बजट पेश करते हुए यह कह चुके थी कि जिस चीज का समय आ गया हो , उसे कोई नहीं रोक सकता। कई भाषाओं के जानकार पीवी नरसिम्हा राव ने संस्कृत में श्लोक सुना उदार आर्थिक नीतियों का स्वागत किया था।
लेकिन, बाराबंकी के जीआईसी ग्राउंड के मैदान में माहौल समाजवादी ही हुआ करता था। उसमें नेहरूवियन समाजवाद का एक रूमान जरूर था, लेकिन उसमें लोहिया और जय प्रकाश का तड़का था, जिन पर आज विद्वतजन ये आरोप चस्पा करते हैं कि इन्होंने युवाओं को उत्पाती बनाया। अब ये लड़के न नेहरू की नीतियां जानते थे और न इनका लोहिया , जय प्रकाश से कोई वास्ता था। लेकिन, शायद राजनीतिक विकास रिस रिस कर पंहुचता पंहुचता इन तक भी पहुंचा था और ये लड़के शहर का राजनीतिक-सामाजिक मिनियेचर बना देते थे। शहर क्या , अब पलटकर गहरी नज़र से देखने पर लगता है कि वह देश की आने वाली राजनीति की प्रस्तावना की पंक्तियां थीं।
शिक्षा की सरकारी गोद से अभी बिल्कुल मोहभंग नहीं हुआ था । सो, शहर के सेठों, रईसों, दर्जियों , दुकानदारों और तथाकथित मध्यम वर्ग के लड़के एक साथ पढ़ते थे। एक साथ ट्यूशन जाते थे, एक साथ गालियां सीखते थे और सब तो नहीं कुछ एक एक साथ खेल भी लेते थे। सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट में आये कुछ साल बीत चुके थे और उस लड़के के साथ क्रिकेट का भी खुमार भी बढ़ ही रहा था। जीआईसी के तबके विशाल ग्राउंड में समानांतर कई सारे क्रिकेट मैच चला करते थे और बैट्समैन आउट होने के बाद तब तक गुल्ली डंडा खेला करता था, जब तक उसकी टीम की बैटिंग नहीं आ जाती थी।
मंदिर और मंडल कमीशन दोनों आ चुके थे। बाबरी मस्जिद गिरे हुए साल दो साल हो चुके थे और' जिस हिंदू का खून न खौले , खून नहीं वह पानी है' के जरिये हिंदुओ को ललकार कर उनका क्वथनांक ( boiling point) घटाया जा रहा था। होते करते वह अभी इतना घट चुका है कि वह अपने जूते मोजे न मिलने पर भी खौलने लगता है।
मंडल कमीशन आ ही चुका था और उसके आने के बाद काफी वबाल भी हो चुका था। लेकिन, अब वह रोजमर्रा के बाप बेटों के वार्तालाप में भी आ चुका था। सवर्ण पिता जब भी अपने पुत्र से रूष्ट होते तो अवधी में कहते , 'आरक्षण आय चुका है। पढ़ाई मा अब दुगुनी मेहनत करो नहीं तो मूंगफली बेचिहो'.। सवर्ण समाज पर एकाएक मूंगफली बेचने का ये जो खतरा मंडराया था, उसकी वजह आरक्षण माना गया। ठीक से केल्कुलेशन भी न कर पाने वाले लड़के भी कहते हम 100 नंबर पाकर भी पीएमटी में नहीं आएंगे और वो 35 नंबर पाकर भी सेलेक्ट हो जाएंगे।
दूसरे वर्ग के लिए आरक्षण सहूलियत से ज्यादा अस्मिता का प्रश्न बना और आरक्षण के लिए होने वाली बहसों और मारों में वो लड़के भी शिरकत करते थे , जिनका न पढ़ाई से ज्यादा वास्ता था और न उनके मनमें सरकारी नौकरी की कोई चाह थी। सामाजिक न्याय आरक्षण के घोड़े पर सवार था और जो जातियां आरक्षण की लिस्ट से बाहर थीं उन्होंने स्वयम्भू तौर पर खुद को प्रतिभाशाली घोषित कर लिया था।
कम्प्यूटर भी आ ही गए थे और कम्प्यूटर वाले कमरे में जूता चप्पल निकालकर जाना पड़ता था। लेकिन, जातियां पासवर्ड बदल बदल कर सामने आ रहीं थीं और हर जाति अपना जूता निकाल सत्ता की मेज पर धर देना चाहती थी । सत्ता के स्थापित ढांचे को चुनौती थी और ये जीआईसी के क्लासरूम और ग्राउंड पर भी दिखता था।
मास्टर लोग कभी कभी रूसी कहानियों के पात्रों जैसे उदास दिखते थे तो कभी फ्रांसीसी क्रांति के नायकों की तरह उत्साही। लेकिन, क्लास पढ़ाते समय वो जब कोई गंभीर बात कहते तो अवधी में कहते और हमारी पूरी जातीय स्मृति सामने आ जाती। अंग्रेजी भारत में यूं घुसी होगी जैसे तंबू में ऊंट घुसता है। तो उस समय साइंस साइड पढ़ने वालों को साइंस साइड कहा जाता था और उसमें पढ़ाई जाने वाली गणित की किताब को गणित2। तो मास्टर साहब फरमाते थे कि या गणित 2 आय। जब मूड़ के पसीना गोड़ तक आय जात है , तब या आवत है।
लेकिन, जैसे-तैसे भी हो ये टीचर पढ़ाया करते थे कि केंद्र पर बने कोण परिधि पर बने कोण के दुने होते हैं। परिधि से केंद्र की ओर आने का यह गणित कितना सामाजिक-राजनीतिक भी था, यह तो उनके छात्रों ने बहुत बाद में जाना।
अब न वह टीचर रहे और न वह जीआईसी। इमारत के रंगरोगन से भी और वहाँ लगे बोर्ड से भी पता चलता है कि इमारत का कुछ पुनरोद्धार हुआ है। ग्राउंड के बड़े हिस्से पर अब प्रशासन काबिज है और वहां एक टीन शेड वाला ऑडिटोरियम हैं , जिसमे राजनीतिक रैलियां और कवि सम्मलेन होते हैं। ग्राउंड में बच्चे नहीं दिखते.. इस सवाल पर पता चला कि स्कूल में ही बच्चे नहीं हैं , ग्राउंड में क्या होंगे। शिक्षा अब निजी हाथों की गोदी में है और एक्सपर्ट कहते हैं कि परिधि से केंद्र में आने का रास्ता वहीं से गुजरता है।
स्कूल के बाहर चारदीवारी पर सूर्य नमस्कार के अभ्यास के फायदे और उसे करने की विधि लिखी है। बाहर टैक्सी स्टैंड है । उबियाये हुए ड्राइवर एक दूसरे से झगड़ रहे हैं।
दोस्तों, उम्मीद है कि इन कहानियों से गुजरते हुए आप कुछ अलग किरदारों से मिले होंगेे। ऐसे ही किरदारों की कहानियां आपके लिए लाता रहूं, ऐसी कोशिश रहेगी। इस कोशिश को अगर आपका सहयोग और समर्थन मिलेगा तो राह आसान रहेगी। उम्मीद है कि आप इस छोटे से प्रयास को अपना समर्थन देंगे।
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