हिंदी आलोचना रेणु से माफी कब मांगेगी

वह भी हिंदी के लिए क्या खतरा ए जान क्या घड़ी रही होगी, जब हिंदी के तथाकथित आलोचकों ने 'मैला आँचल' को आंचलिक उपन्यास करार दिया था। विश्विद्यालयोन के नीम-हकीम प्रोफेसरों ने (जो पार्ट टाइम आलोचक भी थे ) पाठ्यक्रमों में ये सवाल बनाये कि 'मैला आँचल' की आंचलिकता पर टिप्पणी कीजिये।

मैला आँचल की आंचलिकता पर लिखे गए लेखों में अक्सर यह बताने की कोशिश की गई कि मेरीगंज की यह कथा पूर्णिया या ज्यादा से ज्यादा कोसी अंचल की कथा है। इस बहाने वह क्या कहना चाहते थे , वह वह खुद जाने लेकिन यह साफ है कि भारत की आज़ादी के बाद उसके समाज, राजनीति और लोकतांत्रिक विकास की कहानी को सबसे सघन ढंग से कहने वाले मैला आँचल का ठीक ढंग से मूल्यांकन नहीं हुआ।

लोकल ही ग्लोबल है , जैसी पंचलाइन तो बहुत बाद में आईं। लेकिन रेणु ने मैला आँचल के मेरीगंज की कथा को जिस जातीय स्मृति के साथ कहा, वह उसे समग्र और सार्वत्रिक महत्व वाला उपन्यास बना देती है।

आज रेणु का जन्म दिन है। हिंदी आलोचना को रेणु से माफी मांगनी चाहिए।

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Anurag Shukla

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