स्मृतियां भी क्या चीज होती हैं, न जाने किन कोनों से निकलकर हमसे चिपट जाती हैं। इलाहाबाद से पहले बाराबंकी के हमारे एक साथी थे जिनकी ट्यूशन के नोट्स छोड़ किसी भी किताब में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें न जाने कौन गुनाहों का देवता दे गया। एक दिन उन साहब से मिलने गया तो वे बेचारे बलाबला के रो रहे थे। इतना वो तभी रो सकते थे जब फेल-वेल हो गए हों। लेकिन सारे विषयों के ट्यूशन पढ़ते थे और मानते थे कि स्मरण शक्ति और ज्ञान का गहरा संबंध है,इसलिए फेल होने की दूर -दूर तक कोई संभावना नहीं थी। रुदन इतना वास्तविक और आंतरिक था कि हमने गौर से देखा कि साहब कोई किताब पढ़ रहे और एक पन्ना करीब करीब अश्रुपूरित हो चुका है। हमें उम्मीद थी कि विद्या क्वेशचन बैंक टाइप का कुछ पढ़ रहें होंगे,लेकिन जब किताब का कवर देखा तो गुनाहों के देवता का सजिल्द संस्करण था। ज्ञानपीठ का छापा हुआ। हम कई सारे उनके पास गए थे, लेकिन उनका रोना जारी रहा। थोड़ी देर में नार्मल हुए तो बोले यार ये किताब जरुर पढ़ों,ये दुनिया की सबसे अच्छी किताब है। उस समय तक हम अपने को शरत बाबू का शेष प्रश्न और श्रीकांत पढ़कर ही तुरम्म खां समझ रहे थे। उन्होंने बहुत मांगने पर भी किताब नहीं दी। किस्सा आया गया हो गया। लोग कहते थे कि यार वो किताब वो रोज पढ़ा करता है। बाद में हमारे दोस्त मनीष भाई ने हम लोगों को वो किताब उपलब्ध कराई जिसे हम कई लोगों ने मिल बांट कर पढ़ा। रोने की त्रीवता में फर्क हो सकता है। वैसे कस्बे कुछ ज्यादा भावुक होते भी हैं, हिंदी फिल्म में हीरो-हीरोइन की जुदाई पर भी रो पड़ते हैं। लेकिन गुनाहों का देवता पढ़कर हम सब कम ज्यादा रोये । सबने सहमति भी जताई कि ये गजब किताब है। गुनाहों का देवता अपने कथ्य के मुताबिक उस समय के उच्च वर्ग की कथा थी,लेकिन उस समय के और ज्यादा कस्बाई बाराबंकी के ११वीं,बारहवीं के लड़के क्यों रोये थे। ये तब तो समझना बुहत आसान था, लेकिन आज एक ठीक-ठाक अकादमिक सवाल है। बाराबंकी जैसे कस्बेनुमा शहरों में तब और कुछ हद तक अब भी प्रेम एक धूमिल और धूसर संभावना हुआ करता है। कुछ के लिए यह साहसिक करतब भी था। जैसे लड़कियों के स्कूल के सामने खड़ा होना। लड़की के घर वालों या अपने ही घर वालों से पिट जाने के खतरे के बावजूद। और फिर रकीब(एक दूसरे के प्रेम में प्रतिद्धंदी) के झगड़े तो ऐसे होते थे कि कई बार मासूम आशिक पिटते-पिटते लहूलुहान हो जाता था। मेरठ दिल्ली और सब जगह किशोरों के प्रेम के लिए अजीबोगरीब शब्द सुने। लेकिन बाराबंकी में तो सीटियाबाजी शब्द चलता था। गुनाहों का देवता पढ़कर जब बारहवी में पढ़ने वाले तमाम रोये थे (मजे कि बात ये हैं कि मैं दावे से कह सकता हूं कि इनमें से प्रेमिका के नाम पर एक चिडिया भी नहीं थी) तब लड़िकयों के स्कूल कोचिंग के सामने अपनी ड्यूटी का निष्ठा पूर्वक निर्वहन करने वाले और कम से कम तीन प्रेम संबंधों को संतुलित किए हुए एक साथी ने धर्मवीर भारती की इस महान कथा पर दृष्टिपात करने के बाद मुझसे कहा -अरे,यार बड़ी सीटू किताब है। ईका पढ़के तो आदमी सचमुच प्यार मा पड़ जाए। हमने पूछा कि तो फिर तुम साले का झूठमूठ के प्यार में हो। बोले और का बे हमरे बाप यश चोपड़ा वाली फिल्म के बाप थोड़ी हैं, कि कहे जा बेटा मैंने जो गलती चालीस साल पहले की थी वो तू न कर, जा अपने प्यार को पा ले। वे साथी प्रेम के बारे में बहुत व्यवहारिक थे। तीन -तीन प्रेमिकाओं से मर मिटने के वादे करने वाले वो साहब गुनाहों के देवता के चंदर के माथे पर झूलती लटों से भी प्रभावित नहीं हुए और सुधा के प्लेटोनिक (आदर्श) लव में तो खैर उनकी कोई आस्था ही नहीं थी। और जो रोये भी थे वे सुधा चंदर के प्रेम के दुखांत पर रोये थे या अपनी नियति पर। पता नहीं। वे जानते थे कि उनकी नियति पढ़ाई में सफल-असफल होने के मुताबिक उनकी शादी है जिसमें रिश्तेदारीय स्तर की वार्ता सिर्फ दहेज की रकम तय करने के लिए होंगी। उन्हें ज्यादा से ज्यादा ये छूट मिलेगी कि लड़की के रुप-रंग को परख लें। लेकिन इन सबके बाद भी लंबी बोर दुपहरियों से उकताए हुए लड़के-लड़कियां प्रेम करते ही थे। कुछ हार्मोन का भी तकाजा था और कुछ ये मानना भी- वो जवानी भी कोई जवानी है, जिसकी कोई कहानी न हो। चुपचाप फिल्म देखने जाते थे। शहर के ऊबड़-खाबड़ बेतरतीब पार्क में मिलते थे। एक दूसरे को पीटते थे। घरवालों से पिटते थे। तब एफएम रेडियो के लव गुरु होते नहीं थे,लेकिन फिर भी नाम-पता गोपनीय रखने का दावा करने वाले पत्र-पत्रिकाओं में अपने आधे-अधूरे,धोखा खाए या संभावनाशील प्यार के बारे में खत लिखते थे। इस शाशवत जवाब के बाद भी कि अभी आपकी उम्र प्यार करने की नहीं है,आप आकर्षण को प्यार समझ बैठे हैं। अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाईए और जब अपने पांव पर खड़े हो जाएं तो घरवालों के सामने अपनी बात रखें। लेकिन ये खत लिखने वाले लड़के लड़िकयां जानते थे कि अपने पांव पर खड़ा हो जाना उतना आसान भी नहीं है,जितना जवाब में बताया गया है। और घरवाले तो हमेशा प्रेम के मसले पर बड़े प्रश्नवाचक चिह्न की तरह सामने आते थे। बारहवी में ही प्यार में एक साथ जीने-मरने के लिए भगवान औऱ कुरान-ए-पाक की कसम खाने वाले कई को तो मैं भी जानता हूं। कभी-कभी तो लगता है कि ये जानते हुए भी उनका मिलन कभी नहीं हो सकता ( कई जोड़े तो खुद चाहते भी थे कि उनका मिलन कभी हो ही न) वे सिर्फ थ्रिल के लिए प्यार करते थे। कोचिंग क्लासेजों में एक दूसरे को निहारते थे। स्कूल से लौटने वाले रास्तों पर अगली मुलाकात का वादा कर लेते थे। शायद बहुतों की उम्मीद से दबी जिंदगी में यहीं दस पांच मिनट राहत दे जाते थे औऱ वो ये गुनगुनाते हुए लौट आते थे-कह दे कि तू मेरी है वरना,जीना नहीं है मुझको है मरना। लेकिन वे चंदर -सुधा नहीं थे। न लड़कों के माथे पर लटे झूलती थीं और न लड़कियां के पास सुधा जैसा भोलापन था।
गुनाहों के देवता के कथ्य पर साहित्यिक चर्चा मेरा मकसद नहीं है। इलाहबाद में तो लोगो के पास प्रतियोगिता दर्पण परीक्षा मंथन से भरे रैंक में सिलेबस की किताबो के अलावा सिर्फ कलेक्टर बन जाने की संभावना ही रखी होती थी। लेकिन यंहा भी किसी कोने में से चंदर सुधा की अतृप्त प्रेम कथा का आख्यान ऐसे झांकता था जैसे विश्वामित्र की तपस्या के बीच मेनका झांकी होंगी। पाठ्यक्रम में भले ही धर्मवीर भारती का अँधा युग हो लेकिन मन में सभी के अपनी अपनी सुधा थी। अपने अपने चंदर भी रहे होंगे। स्नातक करने आये आजमगढ़ ग़ाज़ीपुर जौनपुर जैसे शहरों के लड़के नीली बत्ती की चाहत में उम्र के तीसरे दशक तक पहुँच जाते थे और जिस सुधा को वो अपने शहरों में छोड़ आये होते थे उनकी सिर्फ सुधियाँ ही बचती थी। तब दाल भात चोखा खाने और इलाहाबाद की लंबी और सडी गर्मी वाली दोपहरी में नियमित नींद लेने के बाद चाय के लिए तभी उतरते थे जब आसपास के किसी गर्ल्स कॉलेज की छुट्टी हुई हो। शाम को कटरा से सिविल लाइन्स तक की पदयात्रा में ये चंदर अक्सर अपनी सुधी को ढूंढा करते थे। कुछ यूनिवर्सिटी में अपनी सुधा तलाश भी लेते थे। शायद यूनिवर्सटी तक आ जाने की छूट पा जाने वाली लड़कियां भी चंदर तलाश रही होती थी। इन सुधा चंदर के घर से आने वाले पैसे का बड़ा हिस्सा पीसीओ वाले ले लेते थे। आईएएस के सपने का पीछा करते लड़के रोमांच जिया करते थे और लड़कियां डिग्री के साथ बहुत कुछ ऐसा समेट ले जाना चाहती थी जो शादी के बाद की उनकी एकरस जिंदगी में यादों का ही सही एक वैविध्य तो भर दे। गुनाहों के देवता और टीवी पर आने जा रही सुधा चंदर की कहानी के बहने ये सब याद आ गया। गुनाहों के देवता का कथ्य चूँकि इलाहाबाद का ही है इसलिए कुछ लोग पुरानी कोठियों में सुधा का मकान खोजते रहते थे। धर्मबीर भारती का एक और उपन्यास है सूरज का सातवाँ घोड। सिनेमा पढ़ते समय इसका जिक्र यू आता था कि दुनिया के महान फिलमकर कुरोसोवा ने शेक्सपियर के एक प्ले को जापनी में एडाप्ट किया और चार पर्सपेक्टिव से कहानी कही। एक ही घटना को कहानी के पात्र अलग अलग ढंग से कहते हैं। फ़िल्म बताती है सत्य निरपेक्ष नहीं होता । आप कँहा से खड़े होकर उसे देख रहे हैं ये महत्वपूर्ण है। सूरज का सातवां घोडा की कहानी उसी अवधारणा से प्रेरित थी। लेकिन हम सुधा और चंदर के सत्य को कँही से भी खड़े होकर देंखे। वो अधूरा ही नज़र आता है। एक अतृप्त प्रेम कथा। सुधा और चंदर में आये तमाम बदलावों के बाद भी। चलो ये कहकर तसल्ली कर ली जाती है कि अतृप्त प्रेम कथाओं की अभिव्यक्ति ही महान् होती है। प्रेम आज भी एक धूमिल और धूसर सम्भावना है।
दोस्तों, उम्मीद है कि इन कहानियों से गुजरते हुए आप कुछ अलग किरदारों से मिले होंगेे। ऐसे ही किरदारों की कहानियां आपके लिए लाता रहूं, ऐसी कोशिश रहेगी। इस कोशिश को अगर आपका सहयोग और समर्थन मिलेगा तो राह आसान रहेगी। उम्मीद है कि आप इस छोटे से प्रयास को अपना समर्थन देंगे।
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